उत्तराखंड से बड़ी खबर

उत्तराखंड में अर्ली वार्निंग सिस्टम की अनदेखी पड़ी भारी, धराली आपदा से सबक लेने की ज़रूरत

उत्तराखंड जैसे आपदा-संवेदनशील राज्य में भू-वैज्ञानिक लंबे समय से नदी परियोजना क्षेत्रों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम (ईडब्ल्यूएस) लगाने की सिफारिश करते आ रहे हैं। खासकर फरवरी 2021 में ऋषिगंगा आपदा के बाद इस मांग ने ज़ोर पकड़ा था। लेकिन शासन स्तर पर इसे गंभीरता से नहीं लिया गया। यदि राज्य में समय रहते प्रभावी ईडब्ल्यूएस सिस्टम लागू किया गया होता, तो धराली आपदा में जनहानि की संख्या शायद कम हो सकती थी।

ऋषिगंगा आपदा के बाद उठी थी चेतावनी
7 फरवरी 2021 को ऋषिगंगा में ग्लेशियर टूटने से अचानक आई बाढ़ ने तबाही मचा दी थी। इस आपदा में ऋषिगंगा और तपोवन हाईड्रो प्रोजेक्ट पूरी तरह तबाह हो गए थे और इनमें कार्यरत 200 से अधिक मजदूर लापता हो गए थे। इसके बाद गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भूगर्भ विभागाध्यक्ष प्रो. एम.पी.एस. बिष्ट समेत कई विशेषज्ञों ने ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में श्रृंखलाबद्ध अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की सिफारिश की थी।

प्रो. बिष्ट का कहना है कि प्रदेश में ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर वहां परियोजना कंपनियों को अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे आपदा आने से पहले अलर्ट जारी कर लोगों की जान बचाई जा सकती है।

स्विट्ज़रलैंड में समय रहते लिया गया एक्शन
प्रो. बिष्ट ने हाल ही में यूरोप के आल्प्स पर्वत में आई एक समान आपदा का उदाहरण देते हुए बताया कि 29 मई को ब्लैटिन गांव के पास एक विशाल ग्लेशियर का हिस्सा टूट गया था, जिससे बर्फ, मलबा और चट्टानों की भारी मात्रा गांव की ओर बह आई। लेकिन वहां पहले से लगे अर्ली वार्निंग सिस्टम की वजह से समय रहते पूरे गांव को खाली करा लिया गया, यहां तक कि भेड़ों और गायों को भी हेलीकॉप्टर से सुरक्षित बाहर निकाला गया।

धराली आपदा के बाद चेतावनी
धराली आपदा के संदर्भ में प्रो. बिष्ट ने चेताया कि अगर शासन अब भी नहीं जागा, तो भविष्य में और भी गंभीर आपदाएं प्रदेश को झेलनी पड़ सकती हैं।

एक सप्ताह बाद भी स्पष्ट नहीं आपदा का कारण
धराली आपदा ने राज्य की आपदा प्रबंधन तैयारियों की सच्चाई उजागर कर दी है। घटना को एक सप्ताह बीत जाने के बावजूद इसके कारणों को लेकर अब तक कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थितियों से बचने के लिए आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक सुझावों को गंभीरता से लेना अब बेहद जरूरी हो गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!