सचिवालय संघ के महामंत्री राजेंद्र रतूड़ी है बेहद खास,कारगिल विजय में मनवा चुके है अपना लोहा
देहरादून। राजेन्द्र रतूड़ी, पूर्व सैनिक एवं वर्तमान में उत्तराखण्ड सचिवालय संघ के महासचिव, उन लोगों में हैं जिन्होंने अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष मातृभूमि की रक्षा के लिए समर्पित किए। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान जब देश की सीमाओं पर युद्ध की विभीषिका अपने चरम पर थी, तब उन्होंने भारतीय सेना के एक सैनिक के रूप में अदम्य साहस, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए राष्ट्ररक्षा का दायित्व निभाया।
कारगिल का युद्ध किसी सामान्य युद्ध जैसा नहीं था। यह उन दुर्गम, बर्फ़ से ढकी ऊँची पहाड़ियों पर लड़ा गया, जहाँ एक ओर दुश्मन की गोलियाँ और गोलाबारी का निरंतर खतरा था, तो दूसरी ओर शून्य से कई डिग्री नीचे तापमान, ऑक्सीजन की कमी, खड़ी चट्टानें और प्रतिकूल मौसम हर पल सैनिकों की परीक्षा लेते थे। ऐसी परिस्थितियों में भी भारतीय सैनिकों ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना मातृभूमि की रक्षा का संकल्प निभाया। राजेन्द्र रतूड़ी भी उन वीर सैनिकों में शामिल रहे जिन्होंने कठिनतम परिस्थितियों में पूरी निष्ठा, साहस और मनोयोग के साथ अपने दायित्व का निर्वहन किया।
भारतीय सेना का जीवन केवल युद्ध तक सीमित नहीं होता। अनुशासन, त्याग, टीम भावना, नेतृत्व, कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता और राष्ट्र को सर्वोपरि मानने का संस्कार सैनिक के व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बन जाता है। यही कारण है कि सैन्य सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनके भीतर राष्ट्रसेवा की वही भावना आज भी जीवित है।
सेना से सेवानिवृत्ति के उपरांत उत्तराखण्ड सचिवालय में सेवा का अवसर मिलने पर उन्होंने प्रशासनिक दायित्वों को भी उसी ईमानदारी और समर्पण से निभाया। वर्तमान में उत्तराखण्ड सचिवालय संघ के महासचिव के रूप में वे कर्मचारियों की समस्याओं के समाधान, उनके अधिकारों की रक्षा, कार्यस्थल की बेहतर व्यवस्थाओं तथा कर्मचारी हितों के लिए निरंतर संघर्षरत हैं। उनका मानना है कि संगठन का नेतृत्व केवल पद प्राप्त करना नहीं, बल्कि प्रत्येक कर्मचारी के विश्वास पर खरा उतरना और उनकी आवाज़ बनना है।
उनकी कार्यशैली में आज भी सेना की अनुशासनप्रियता, समयबद्धता, पारदर्शिता और टीम भावना स्पष्ट दिखाई देती है। चाहे कर्मचारियों के हितों से जुड़े मुद्दों पर शासन-प्रशासन से संवाद करना हो, लंबित समस्याओं के समाधान के लिए प्रयास करना हो या संगठन को सशक्त बनाना हो—वे हर कार्य को सेवा के भाव से करते हैं।
उनका जीवन इस बात का प्रेरक उदाहरण है कि राष्ट्रसेवा केवल सीमा पर हथियार लेकर ही नहीं, बल्कि समाज, प्रशासन और संस्थाओं में ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और जनहित के साथ कार्य करके भी की जा सकती है। कारगिल की बर्फ़ीली चोटियों पर जो सेवा और समर्पण का संकल्प उन्होंने लिया था, वही संकल्प आज उत्तराखण्ड सचिवालय में कर्मचारियों के हितों और जनसेवा के माध्यम से निरंतर आगे बढ़ रहा है।
“वर्दी बदल सकती है, लेकिन सैनिक का चरित्र नहीं। सीमाओं की रक्षा हो या कर्मचारियों के अधिकारों की लड़ाई—कर्तव्य, अनुशासन, ईमानदारी और राष्ट्रहित का संकल्प जीवनभर साथ रहता है।”
