हेमा नेगी करासी को मिला उत्तराखण्ड गौरव सम्मान,अमित शाह और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने किया सम्मानित
देहरादून। उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति, पारंपरिक जागर गायन और लोकपरंपराओं को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने वाली सुप्रसिद्ध लोकगायिका एवं जागर सम्राज्ञी हेमा नेगी करासी को उत्तराखण्ड गौरव सम्मान-2026 से सम्मानित किया गया। राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर देहरादून के परेड ग्राउंड में आयोजित राज्योत्सव समारोह में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उन्हें यह प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किया। लोक जागर गायन के क्षेत्र में करीब 25 वर्षों के योगदान के लिए मिला यह सम्मान उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में उनके प्रयासों का सम्मान है।
रुद्रप्रयाग जनपद के अगस्त्यमुनि विकासखंड के ग्राम तुखिंडा में 5 अप्रैल 1984 को जन्मीं हेमा नेगी करासी का जीवन संघर्षों के बीच आगे बढ़ा। महज चार वर्ष की उम्र में पिता का साया उठने के बाद उनकी माता बच्ची देवी ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली और बेटी की संगीत के प्रति रुचि को आगे बढ़ने का अवसर दिया। बचपन से ही मांगल गीतों, जागरों और पहाड़ की पारंपरिक धुनों से जुड़ाव रखने वाली हेमा ने इसी रुचि को अपनी साधना और पहचान बनाया।
वर्ष 2003 में राजकीय इंटर कॉलेज काण्डई के वार्षिकोत्सव में ‘धरती हमारा गढ़वाल’ गीत की प्रस्तुति से उनके सार्वजनिक सांगीतिक सफर की शुरुआत हुई। वर्ष 2005 में उनकी पहली गढ़वाली ऑडियो एल्बम ‘क्या बुन तब’ रिलीज हुई। इसी दौरान उन्हें प्रख्यात लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी के साथ ‘कथा कार्तिक स्वामी’ में काम करने का अवसर मिला। शुरुआती चुनौतियों के बावजूद उन्होंने लोकगायन के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।
हेमा नेगी करासी ने आछरी जागर, नागराज जागर, चण्डिका भजन, देवी-देवताओं के पारंपरिक जागर और मांगल गीतों के माध्यम से उत्तराखण्ड की समृद्ध लोकपरंपराओं को नई पहचान दिलाई। पारंपरिक पहाड़ी वेशभूषा, लोकभाषा और सांस्कृतिक परंपराओं को मंच पर प्रमुखता से प्रस्तुत करना भी उनकी पहचान रही है। उन्होंने लोकसंगीत को केवल मनोरंजन का माध्यम न मानकर पहाड़ की आस्था, परंपराओं और सामाजिक जीवन की विरासत के रूप में आगे बढ़ाया।
उनकी गायकी का प्रभाव उत्तराखण्ड तक सीमित नहीं रहा। न्यूजीलैंड, दुबई, इंग्लैंड और जापान सहित विभिन्न देशों में प्रस्तुतियां देकर उन्होंने प्रवासी उत्तराखण्डियों को अपनी संस्कृति और जन्मभूमि से जोड़ने का प्रयास किया। डिजिटल माध्यमों के जरिए भी उनके लोकगीत और जागर नई पीढ़ी तक पहुंच रहे हैं।
करीब ढाई दशक की सांस्कृतिक साधना के दौरान उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। इनमें संगीत नाटक अकादमी, भारत सरकार का उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार-2024, उत्तराखण्ड सरकार का तीलू रौतेली पुरस्कार-2025, मां नंदा शक्ति सम्मान-2021 और अमेजिंग इंडिया अवॉर्ड-2026 प्रमुख हैं।
सम्मान मिलने पर भावुक हेमा नेगी करासी ने इसे अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि के बजाय पूरे उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति, लोककलाकारों और मातृशक्ति का सम्मान बताया। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय माता के आशीर्वाद, परिवार के सहयोग, पति अनिल करासी, गुरुजनों के मार्गदर्शन और श्रोताओं के स्नेह को दिया। उन्होंने कहा कि उनका प्रयास आछरी जागर, नागराज जागर, चण्डिका भजन और मांगल गीतों जैसी पारंपरिक विधाओं का व्यवस्थित संकलन एवं संरक्षण कर उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है।
हेमा नेगी करासी की यह उपलब्धि पहाड़ की उस बेटी के संघर्ष और संकल्प की कहानी भी है, जिसने अपनी जड़ों से जुड़े रहकर लोकधुनों को व्यापक पहचान दिलाई। उत्तराखण्ड गौरव सम्मान के जरिए उनकी वर्षों की साधना को प्रदेश स्तर पर मिला यह सम्मान लोकसंस्कृति के संरक्षण में जुटे कलाकारों के लिए भी प्रेरणादायी है।

