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उत्तराखंड आपदा विभाग में हैरान करने वाला मामला,6 करोड़ 60 लाख रुपये का नहीं मिल रहा है हिसाब किताब

देहरादून।  यूएनडीपी के माध्यम से आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र को आपदा जागरूकता और विकास कार्यक्रमों हेतु मिले करोड़ों रुपए के बजट में से 6 करोड़ 60 लाख रुपय ठिकाने लगाए जाने का मामला सामने आया है। आपदा प्रबंधन विभाग के पास इस धनराशि के व्यय का विवरण और रिकॉर्ड गायब। ऑडिट ऑब्जेक्शन के बाद विभाग के अधिकारियों ने किया मौन धारण कर दिया है।

आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव रंजीत सिन्हा ने दिनांक 24 जनवरी 2024 को हुई शासी निकाय की बैठक में मुख्य सचिव एस. एस. संधू के समक्ष आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र में हुए घोटालों के प्रकरणों को प्रस्तुत करते हुए बैठक के कार्यवृत्त के बिंदु संख्या 5 में एक बहुत बड़े घोटाले को स्वीकार करते हुये उसके साक्ष्य मुख्य सचिव के समक्ष प्रस्तुत किये।

जिसमें उन्होंने मुख्य सचिव को अवगत करवाया कि आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबन्धन केंद्र में संविदा में कार्यरत अधिशासी निदेशक पीयूष रौतेला और वित्त अधिकारी के०एन०पाण्डे ने यूएनडीपी के माध्यम से आपदा जागरूकता और विकास कार्यक्रमों हेतु मिले करोड़ों रुपए की धनराशि में से 6,23,90,513/ (छह करोड़ तेईस लाख नब्बे हजार पांच सौ तेरह) रुपय ठिकाने लगा दिये गये, सबसे ज्यादा हैरानी की बात तो यह है कि इस धनराशि के खर्च का कोई भी विवरण और रिकॉर्ड आपदा प्रबंधन विभाग और आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र के पास उपलब्ध नहीं है।

इसके अलावा सचिव रंजीत सिन्हा ने मुख्य सचिव को अवगत करवाया कि यूएनडीपी के बजट से अधिशासी निदेशक पीयूष रौतेला और वित्त अधिकारी के.एन. पांडे ने बिना अनुमति के 35 लाख रुपए “द साइलेंट हीरो” नामक व्यवसायिक फिल्म के निर्माण में खर्च कर दिए। इस प्रकार यूएनडीपी के बजट से गबन की गई और ठिकाने लगाई गई कुल धनराशि 6,58,90,513/ (छह करोड़ अट्ठावन लाख नब्बे हजार पांच सौ तेरह) रुपय है, जिनके खर्च का आपदा प्रबंधन विभाग के पास कोई विवरण और रिकार्ड उपलब्ध नहीं है।

यूएनडीपी बजट घोटाले के इस प्रकरण पर विभागीय सूत्रों से पता चला है कि अधिशासी निदेशक पीयूष रौतेला और वित्त अधिकारी के.एन पांडे के अलावा तकनीकी सहायक के पद पर संविदा में कार्यरत एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी घनश्याम टम्टा की भी संलिप्तता है। घनश्याम टम्टा को यूएनडीपी बजट से आहरित और खर्च की गई धनराशि के लिए फर्जी बिलों की व्यवस्था करने का कार्य दिया गया था।

*घोटाले के इस प्रकरण पर निम्न पहलुओं की जांच कराया जाना अत्यंत आवश्यक है।*

1- 03 संविदा कर्मचारियों ने यूएनडीपी से प्राप्त करोड़ों रुपए के बजट को फर्जी बिलों से ठिकाने लगा दिया, क्या विभागीय उच्च अधिकारियों को इसकी भनक नहीं लगी, या फिर सब कुछ जानते हुए इस घोटाले के लिए मूकसहमती प्रदान की गयी है।

2- यूएनडीपी से प्राप्त करोड़ों रुपय के बजट को आहरण करने और खर्च करने का अधिकार 03 संविदा कर्मचारियों को क्यों और किस नियम के अनुसार दिया गया।

3- इसकी जांच की जानी आवश्यक है कि फर्जी बिलों से गबन की गई 6,23,90,513/ (छह करोड़ तेईस लाख नब्बे हजार पांच सौ तेरह) रुपय की धनराशि की विभाग के किन-किन अधिकारियों व कर्मचारियों में बंदरबांट की गई।

4- यदि यूएनडीपी से प्राप्त बजट को खर्च किया गया है तो फिर उस खर्च का विवरण और खर्च के सापेक्ष प्राप्त बिलों का रिकॉर्ड आपदा प्रबंधन विभाग के पास धारित क्यों नहीं है।

5- यदि फर्जी बिलों से धनराशि का समायोजन किया गया है तो आपदा प्रबंधन विभाग के रिकॉर्ड में वे सारे फर्जी बिल उपलब्ध क्यों नहीं है।

6- विभागीय सूत्रों से पता चला है कि इन घोटालों की शिकायत प्राप्त होने के बाद वित्त अधिकारी के.एन. पांडे और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी घनश्याम टम्टा ने सारे फर्जी बिलों को रिकॉर्ड से हटाकर नष्ट करवा दिया है।

7- पत्रावलियों को फाड़ने और ऑफिस रिकॉर्ड से दस्तावेजों को गायब करने की पूर्व कार्मिक द्वारा की गई लिखित शिकायत प्राप्त होने के बावजूद भी आपदा प्रबंधन विभाग के अधिकारियों ने अधिशासी निदेशक पीयूष रौतेला, वित्त अधिकारी के.एन पांडे, घनश्याम टम्टा, मोहन राठौर और गोविंद रौतेला के विरुद्ध जांच की कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

8- पत्रावलियों को फाड़ने की शिकायत के सापेक्ष गठित जांच समिति के समक्ष विभागीय कर्मचारियों से झूठी गवाही क्यों दिलवाई गई। क्या उच्च अधिकारियों द्वारा इस प्रकरण पर पर्दा डालने का प्रयास किया गया।

9- क्या कारण है कि शासी निकाय में मुख्य सचिव के द्वारा गबन के इस प्रकरण पर विधिक कार्रवाई किए जाने और गबन की गई धनराशि की रिकवरी किए जाने के आदेश निर्गत किए जाने के 14 माह बाद भी आरोपी अधिकारियों कर्मचारियों से इस धनराशि की रिकवरी नहीं की गई है, और ना ही उन पर कोई विधिक और दंडात्मक कार्रवाई की गई है।

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